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Thursday, 29 December 2011

ग़मों की काली छाया

जो तुमने दास्ताँ अपनी सुनाई आँख भर आई
बहुत देखे थे दुःख मैंने मगर क्यूं आँख भर आई

ग़मों से दुश्मनी लगती है बिलकुल दोस्ती जैसी
खुदा भी जल गया हमसे कि जब ये दोस्ती देखी

खराशें दिल में हैं तो फिर मुझे नश्तर से क्या डर है
डराना है अगर मुझको तो फिर कुछ और गम देदो

सुकूँ मुझको नहीं मिलता है इस बेपाख़ दुनिया में
तमन्ना अब तो इतनी है कि फिर से जनम देदो

जहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ हों और खुशियाँ ही खुशियाँ हों
ग़मों की काली छाया से न कोई इल्म मेरा हो

Thursday, 15 December 2011

क्षणिकाएं

दीदार हो न जाये उनका मैं डरता हूँ
ये सोच के उनकी गली से ना गुजरता हूँ
पर क्या करूँ जन्नत है उस गली में ही
ये सोच के छुप छुप के मैं गुजरता हूँ

क्षणिकाएं

आज फिर दिल ने उन्हें याद किया
मेरी बर्बादियों को और भी बर्बाद किया
ग़म जो थे दिल के किसी कोने में दफ्न
उनके तोहफों ने फिर उनका आगाज़ किया

Sunday, 11 December 2011

क्षणिकाएं

इक दिल तो है पर गम-ए-दर्द कहा से लाऊं
लिखने का शौक तो है पर शब्द कहा से लाऊँ
कोशिश जो की गम-ए-रुसवाई को लिखने की
पर चेहरों को पढने की नज़र कहा से लाऊं

Wednesday, 7 December 2011

तमाशाबीन तो नहीं

आये दिन हम न्यूज़पपेर्स में छेड़छाड़ किस्से पढ़ते रहते हैं शायद हम सभी को शर्मिंदगी होती है और डरते हैं कि कहीं.... मैंने इस बारे में कुछ लोगों से बात की और कुछ पंक्तियाँ तैयार की जो आप से बांटना चाहता हूँ.

मत देख ऐसे मैं तमाशाबीन तो नहीं
खुबसूरत हूँ पर घूरने की चीज़ तो नहीं
घर से निकलते ही डर लगता है
पर किस किस से डरूं ये मालूम ही नहीं
मिला जो खुदा तो पूंछना ये है
कि खूबसूरती सबकी एक सी क्यूँ नहीं
जब दिल भी सबका एक सा
तो रंग रूप और सोच एक सी क्यों नहीं
तालीम दी रोशन किया
पर इनको नफ्स पे काबू क्यूँ नहीं
पहचान खो जाये
ये सोच के घर से निकलना है
सारी बंदिशें तोड़ के आंगे बढ़ना है
तू कर या कर
पर इस सोंच को बदलना है
कि हम तमाशबीन ही नहीं.

Friday, 2 December 2011

मिट गया वो इस कदर

मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.
था वो साया मौत का जो अश्क फिर से भर गया.

ढूँढा उसे हर शाख पर हर कौम में हर चक्षु में
पूँछा जो हर एक मोड़ से तो हर जगह बस ये मिला
कि मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.

अर्ज़-ए-इबादत खूब की हर कब्र पे हर घाट पे
क़ाज़ी मिले पंडे मिले मिलके सभी कहने लगे
कि मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.

ना लफ्ज़ थे ना इल्म था जज़्बात थे कुछ इस कदर
नज़्मे लिखीं गजलें बनी कुछ पंक्तियाँ ऐसी बनी
कि मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.

ख्वाब थे कुछ याद से सिमटे से और बेहाल से
फ़रियाद की जब रब से कि कर दे इनायत हमपे भी
तो बस यही गूंजा वहां कर ले यकीं ऐ मेरे दिल
कि मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.

(kaushal kishor) kanpur

Thursday, 1 December 2011

कुछ यूं लिखूं

इक कलम था इक थी दुआ
और शब्द थे कुछ पुष्प से
बांधा उन्हें फिर सोच कर
तो बन गयी आराधना
हे हंसवाहिनी अर्पण तुझे
इस भक्त की ये साधना
करलो इसे स्वीकार
और देदो मुझे कुछ ज्ञान अब
कि लिख सकूं इस देश पर
इस देश की सच्चाई पर
बस दे मुझे कुछ ताकतें
मेरी कलम और मेरी सोच में
लिख दूं नयी इक दास्तान
बदले जो हर इक सोच को
पढ़ कर जिसे बस सब कहें
क़ी अमल कर बस अमल कर

मन में तो है कुछ यूं लिखूं
इश्वर लिखूं
अल्लाह लिखूं
गोविन्द लिखूं
जीसस लिखूं
हर शख्श की पहचान हो
तोडूँ सभी ये सरहदें
हम एक थे और एक हैं
बाटों न अब जज़्बात से
जब रूह सबकी एक है
जागो सभी उठ कर चलो
मिल कर चलो बढ़ते चलो
न कोई दुश्मन उठ सके
जो सरहदें पैदा करे

आओ तो ये सौगंध लें
समझेंगे ताकत कलम की
फिर मिलके सब ऐसा लिखें
कि लब हिलें तो बस कहें
कि अमल कर बस अमल कर
बस अमल कर बस अमल कर.......

(कौशल किशोर) कनपुर

Wednesday, 30 November 2011

रूहें तो अब भी एक हैं

इश्क में हम भी जो थे
और इश्क में वो भी जो थे
प्यार कुछ हमको भी था
और प्यार कुछ उनको भी था
फरमाईशें तो कुछ मेरी भी थीं
फरमाईशें तो कुछ उनकी भी थीं
छुप छुप के फिर हम भी मिले
छुप छुप के फिर वो भी मिले
मोहब्बत जो यूं फिर जवां हुई
तन्हाईयाँ भी सब मिटने लगीं
कस्मे हुईं वादे हुए
रुसवाईयों से भी डरने लगे
सपने भी फिर देखे गए
आखों से जो न बोझिल हुए
शाहिद जो कुछ मेरे बने
शाहिद जो कुछ उनके बने

और फिर क्या था...........

टूटे सभी वो ताजमहल
ख्वाबों में जो हमने चुने
इक कब्र फिर मेरी खुदी
इक कब्र फिर उनकी खुदी
कस्मे दबीं वादे दबे
और जिस्म भी दाबे गए
रोते हैं फिर तकदीर को
कैसे मिलें कैसे मिलें
पर अक्ल थी मारी गयी
जो जिस्म के भूखे थे हम
रूहें तो अब भी एक हैं
और बदनामियों से दूर हैं
हम भी हैं खुश वो भी हैं खुश
और खुशनमाँ माहौल है
रूहें तो अब भी एक हैं
रूहें तो अब भी एक हैं

(कौशल किशोर) कानपुर

Thursday, 24 November 2011

हिना के जैसी सुन्दर थी

वो कितनी प्यारी  प्यारी  थी
कुछ खुशबू सौंधी  सौंधी थी
कुछ हिना के जैसी सुन्दर थी
कुछ गुलशन जैसी महकी थी
कुछ समीर सी चंचल थी
कुछ माखन सी तासीर भी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी


एक दिल था भोला  भाला सा
जिसमे कितनी गहराई थी
नैना थे बिलकुल हिरनी से
दुनिया की जिनमे परछाईं थी
सीरत तो बिलकुल ऐसी कि  
जैसे खुदा से शोहरत पायी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी.

जब मुझे देखती थी वो तब
सारी खुशियाँ मिल जाती थी
सोंचा इक दिन मैंने कि
बस उसकी तस्वीर बना डालूँ
पर बन कर जब तैयार हुई
तो अपनी ही बेटी पाई थी.
अब इतना ही बस कहना है
वो कितनी प्यारी प्यारी है.
वो सबसे  प्यारी प्यारी है.
- कौशल किशोर, कानपुर

तू भी कल प्यार में हो

मत उठा मेरे प्यार पे ऊँगली ऐ शाहिद 
मत करा  दूर दो रूंहों को अलग ऐ शाहिद 
हम भी अल्लाह के बन्दे हैं कुछ तो डर ऐ शाहिद 
कहीं ऐसा न हो कि, तू भी कल प्यार में हो और बन जाऊं मैं शाहिद