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Thursday, 19 January 2012

जोश

अन्जान राह पे चलते चलते
थक गये हैं अब कदम

हो गयी है इन्तहां

दुखने लगे हैं अब जखम

करता रहा ज़ो जी हुजूरी

और गिरा
हर बार हूँ
हिम्मत तो देखो

इक बार फिर लड़ने को मै तैयार हूँ

Wednesday, 4 January 2012

चुप हूँ पर


चुप हूँ पर मेरी चुप्पी को ख़ामोश न समझो
मै तो इशारों से ही तुझे राख़ बना सकता हूँ

ख़ुशनसीब है तू जो नाखुदा हमारा एक है
कश्ती तो मैं तूफाँ में भी चला सकता हूँ.

शुक्र कर ख़ुदा का जो हम साथ हैं इस राह पर
तेरे ग़ुरूर को हर राह पे झुका सकता हूँ

इंसान है इंसानियत को कुछ तो इज्ज़त दे
तेरी हैवानियत को हर लफ्ज़ से मिटा सकता हूँ