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Wednesday, 30 November 2011

रूहें तो अब भी एक हैं

इश्क में हम भी जो थे
और इश्क में वो भी जो थे
प्यार कुछ हमको भी था
और प्यार कुछ उनको भी था
फरमाईशें तो कुछ मेरी भी थीं
फरमाईशें तो कुछ उनकी भी थीं
छुप छुप के फिर हम भी मिले
छुप छुप के फिर वो भी मिले
मोहब्बत जो यूं फिर जवां हुई
तन्हाईयाँ भी सब मिटने लगीं
कस्मे हुईं वादे हुए
रुसवाईयों से भी डरने लगे
सपने भी फिर देखे गए
आखों से जो न बोझिल हुए
शाहिद जो कुछ मेरे बने
शाहिद जो कुछ उनके बने

और फिर क्या था...........

टूटे सभी वो ताजमहल
ख्वाबों में जो हमने चुने
इक कब्र फिर मेरी खुदी
इक कब्र फिर उनकी खुदी
कस्मे दबीं वादे दबे
और जिस्म भी दाबे गए
रोते हैं फिर तकदीर को
कैसे मिलें कैसे मिलें
पर अक्ल थी मारी गयी
जो जिस्म के भूखे थे हम
रूहें तो अब भी एक हैं
और बदनामियों से दूर हैं
हम भी हैं खुश वो भी हैं खुश
और खुशनमाँ माहौल है
रूहें तो अब भी एक हैं
रूहें तो अब भी एक हैं

(कौशल किशोर) कानपुर

Thursday, 24 November 2011

हिना के जैसी सुन्दर थी

वो कितनी प्यारी  प्यारी  थी
कुछ खुशबू सौंधी  सौंधी थी
कुछ हिना के जैसी सुन्दर थी
कुछ गुलशन जैसी महकी थी
कुछ समीर सी चंचल थी
कुछ माखन सी तासीर भी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी


एक दिल था भोला  भाला सा
जिसमे कितनी गहराई थी
नैना थे बिलकुल हिरनी से
दुनिया की जिनमे परछाईं थी
सीरत तो बिलकुल ऐसी कि  
जैसे खुदा से शोहरत पायी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी.

जब मुझे देखती थी वो तब
सारी खुशियाँ मिल जाती थी
सोंचा इक दिन मैंने कि
बस उसकी तस्वीर बना डालूँ
पर बन कर जब तैयार हुई
तो अपनी ही बेटी पाई थी.
अब इतना ही बस कहना है
वो कितनी प्यारी प्यारी है.
वो सबसे  प्यारी प्यारी है.
- कौशल किशोर, कानपुर

तू भी कल प्यार में हो

मत उठा मेरे प्यार पे ऊँगली ऐ शाहिद 
मत करा  दूर दो रूंहों को अलग ऐ शाहिद 
हम भी अल्लाह के बन्दे हैं कुछ तो डर ऐ शाहिद 
कहीं ऐसा न हो कि, तू भी कल प्यार में हो और बन जाऊं मैं शाहिद