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Thursday, 19 January 2012

जोश

अन्जान राह पे चलते चलते
थक गये हैं अब कदम

हो गयी है इन्तहां

दुखने लगे हैं अब जखम

करता रहा ज़ो जी हुजूरी

और गिरा
हर बार हूँ
हिम्मत तो देखो

इक बार फिर लड़ने को मै तैयार हूँ

Wednesday, 4 January 2012

चुप हूँ पर


चुप हूँ पर मेरी चुप्पी को ख़ामोश न समझो
मै तो इशारों से ही तुझे राख़ बना सकता हूँ

ख़ुशनसीब है तू जो नाखुदा हमारा एक है
कश्ती तो मैं तूफाँ में भी चला सकता हूँ.

शुक्र कर ख़ुदा का जो हम साथ हैं इस राह पर
तेरे ग़ुरूर को हर राह पे झुका सकता हूँ

इंसान है इंसानियत को कुछ तो इज्ज़त दे
तेरी हैवानियत को हर लफ्ज़ से मिटा सकता हूँ


Thursday, 29 December 2011

ग़मों की काली छाया

जो तुमने दास्ताँ अपनी सुनाई आँख भर आई
बहुत देखे थे दुःख मैंने मगर क्यूं आँख भर आई

ग़मों से दुश्मनी लगती है बिलकुल दोस्ती जैसी
खुदा भी जल गया हमसे कि जब ये दोस्ती देखी

खराशें दिल में हैं तो फिर मुझे नश्तर से क्या डर है
डराना है अगर मुझको तो फिर कुछ और गम देदो

सुकूँ मुझको नहीं मिलता है इस बेपाख़ दुनिया में
तमन्ना अब तो इतनी है कि फिर से जनम देदो

जहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ हों और खुशियाँ ही खुशियाँ हों
ग़मों की काली छाया से न कोई इल्म मेरा हो

Thursday, 15 December 2011

क्षणिकाएं

दीदार हो न जाये उनका मैं डरता हूँ
ये सोच के उनकी गली से ना गुजरता हूँ
पर क्या करूँ जन्नत है उस गली में ही
ये सोच के छुप छुप के मैं गुजरता हूँ

क्षणिकाएं

आज फिर दिल ने उन्हें याद किया
मेरी बर्बादियों को और भी बर्बाद किया
ग़म जो थे दिल के किसी कोने में दफ्न
उनके तोहफों ने फिर उनका आगाज़ किया

Sunday, 11 December 2011

क्षणिकाएं

इक दिल तो है पर गम-ए-दर्द कहा से लाऊं
लिखने का शौक तो है पर शब्द कहा से लाऊँ
कोशिश जो की गम-ए-रुसवाई को लिखने की
पर चेहरों को पढने की नज़र कहा से लाऊं

Wednesday, 7 December 2011

तमाशाबीन तो नहीं

आये दिन हम न्यूज़पपेर्स में छेड़छाड़ किस्से पढ़ते रहते हैं शायद हम सभी को शर्मिंदगी होती है और डरते हैं कि कहीं.... मैंने इस बारे में कुछ लोगों से बात की और कुछ पंक्तियाँ तैयार की जो आप से बांटना चाहता हूँ.

मत देख ऐसे मैं तमाशाबीन तो नहीं
खुबसूरत हूँ पर घूरने की चीज़ तो नहीं
घर से निकलते ही डर लगता है
पर किस किस से डरूं ये मालूम ही नहीं
मिला जो खुदा तो पूंछना ये है
कि खूबसूरती सबकी एक सी क्यूँ नहीं
जब दिल भी सबका एक सा
तो रंग रूप और सोच एक सी क्यों नहीं
तालीम दी रोशन किया
पर इनको नफ्स पे काबू क्यूँ नहीं
पहचान खो जाये
ये सोच के घर से निकलना है
सारी बंदिशें तोड़ के आंगे बढ़ना है
तू कर या कर
पर इस सोंच को बदलना है
कि हम तमाशबीन ही नहीं.