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जोश

अन्जान राह पे चलते चलते
थक गये हैं अब कदम
हो गयी है इन्तहां
दुखने लगे हैं अब जखम
करता रहा ज़ो जी हुजूरी
और गिराहर बार हूँ
हिम्मत तो देखो
इक बार फिर लड़ने को मै तैयार हूँ

चुप हूँ पर

चुप हूँ पर मेरी चुप्पी को ख़ामोश न समझो
मै तो इशारों से ही तुझे राख़ बना सकता हूँ

ख़ुशनसीब है तू जो नाखुदा हमारा एक है
कश्ती तो मैं तूफाँ में भी चला सकता हूँ.

शुक्र कर ख़ुदा का जो हम साथ हैं इस राह पर
तेरे ग़ुरूर को हर राह पे झुका सकता हूँइंसान है इंसानियत को कुछ तो इज्ज़त दे
तेरी हैवानियतको हर लफ्ज़ से मिटा सकता हूँ

ग़मों की काली छाया

जो तुमने दास्ताँ अपनी सुनाई आँख भर आई
बहुत देखे थे दुःख मैंने मगर क्यूं आँख भर आई

ग़मों से दुश्मनी लगती है बिलकुल दोस्ती जैसी
खुदा भी जल गया हमसे कि जब ये दोस्ती देखी

खराशें दिल में हैं तो फिर मुझे नश्तर से क्या डर है
डराना है अगर मुझको तो फिर कुछ और गम देदो

सुकूँ मुझको नहीं मिलता है इस बेपाख़ दुनिया में
तमन्ना अब तो इतनी है कि फिर से जनम देदो

जहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ हों और खुशियाँ ही खुशियाँ हों
ग़मों की काली छाया से न कोई इल्म मेरा हो

क्षणिकाएं

दीदार हो न जाये उनका मैं डरता हूँ
ये सोच के उनकी गली से ना गुजरता हूँ
पर क्या करूँजन्नत है उस गली में ही
ये सोच के छुप छुप के मैं गुजरता हूँ

क्षणिकाएं

आज फिर दिल ने उन्हें याद किया
मेरी बर्बादियों को और भी बर्बाद किया
ग़म जो थे दिल के किसी कोने में दफ्न
उनके तोहफों ने फिर उनका आगाज़ किया

क्षणिकाएं

इक दिल तो है पर गम-ए-दर्द कहा से लाऊं
लिखने का शौक तो है पर शब्द कहा से लाऊँ
कोशिश जो की गम-ए-रुसवाई को लिखने की
पर चेहरों को पढने की नज़र कहा से लाऊं

तमाशाबीन तो नहीं