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Showing posts from December, 2011

ग़मों की काली छाया

जो तुमने दास्ताँ अपनी सुनाई आँख भर आई
बहुत देखे थे दुःख मैंने मगर क्यूं आँख भर आई

ग़मों से दुश्मनी लगती है बिलकुल दोस्ती जैसी
खुदा भी जल गया हमसे कि जब ये दोस्ती देखी

खराशें दिल में हैं तो फिर मुझे नश्तर से क्या डर है
डराना है अगर मुझको तो फिर कुछ और गम देदो

सुकूँ मुझको नहीं मिलता है इस बेपाख़ दुनिया में
तमन्ना अब तो इतनी है कि फिर से जनम देदो

जहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ हों और खुशियाँ ही खुशियाँ हों
ग़मों की काली छाया से न कोई इल्म मेरा हो

क्षणिकाएं

दीदार हो न जाये उनका मैं डरता हूँ
ये सोच के उनकी गली से ना गुजरता हूँ
पर क्या करूँजन्नत है उस गली में ही
ये सोच के छुप छुप के मैं गुजरता हूँ

क्षणिकाएं

आज फिर दिल ने उन्हें याद किया
मेरी बर्बादियों को और भी बर्बाद किया
ग़म जो थे दिल के किसी कोने में दफ्न
उनके तोहफों ने फिर उनका आगाज़ किया

क्षणिकाएं

इक दिल तो है पर गम-ए-दर्द कहा से लाऊं
लिखने का शौक तो है पर शब्द कहा से लाऊँ
कोशिश जो की गम-ए-रुसवाई को लिखने की
पर चेहरों को पढने की नज़र कहा से लाऊं

तमाशाबीन तो नहीं

मिट गया वो इस कदर

मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला. था वो साया मौत का जो अश्क फिर से भर गया.
ढूँढा उसे हर शाख पर हर कौम में हर चक्षु में पूँछा जो हर एक मोड़ से तो हर जगह बस ये मिला कि मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.
अर्ज़-ए-इबादत खूब की हर कब्र पे हर घाट पे क़ाज़ी मिले पंडे मिले मिलके सभी कहने लगे कि मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.
ना लफ्ज़ थे ना इल्म था जज़्बात थे कुछ इस कदर नज़्मे लिखीं गजलें बनी कुछ पंक्तियाँ ऐसी बनी कि मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.
ख्वाब थे कुछ याद से सिमटे से और बेहाल से फ़रियाद की जब रब से कि कर दे इनायत हमपे भी तो बस यही गूंजा वहां कर ले यकीं ऐ मेरे दिल कि मिट गया वो इस कदर कि राख में भी ना मिला.
(kaushal kishor) kanpur

कुछ यूं लिखूं

इक कलम था इक थी दुआ और शब्द थे कुछ पुष्प से बांधा उन्हें फिर सोच कर तो बन गयी आराधना हे हंसवाहिनी अर्पण तुझे इस भक्त की ये साधना करलो इसे स्वीकार और देदो मुझे कुछ ज्ञान अब
कि लिख सकूं इस देश पर इस देश की सच्चाई पर बस दे मुझे कुछ ताकतें मेरी कलम और मेरी सोच में लिख दूं नयी इक दास्तान बदले जो हर इक सोच को पढ़ कर जिसे बस सब कहें
क़ी अमल कर बस अमल कर
मन में तो है कुछ यूं लिखूं इश्वर लिखूं अल्लाह लिखूं गोविन्द लिखूं जीसस लिखूं हर शख्श की पहचान हो तोडूँ सभी ये सरहदें हम एक थे और एक हैं बाटों न अब जज़्बात से जब रूह सबकी एक है जागो सभी उठ कर चलो मिल कर चलो बढ़ते चलो न कोई दुश्मन उठ सके जो सरहदें पैदा करे
आओ तो ये सौगंध लें समझेंगे ताकत कलम की फिर मिलके सब ऐसा लिखें कि लब हिलें तो बस कहें कि अमल कर बस अमल कर
बस अमल कर बस अमल कर.......

(कौशल किशोर) कनपुर