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Wednesday, 30 November 2011

रूहें तो अब भी एक हैं

इश्क में हम भी जो थे
और इश्क में वो भी जो थे
प्यार कुछ हमको भी था
और प्यार कुछ उनको भी था
फरमाईशें तो कुछ मेरी भी थीं
फरमाईशें तो कुछ उनकी भी थीं
छुप छुप के फिर हम भी मिले
छुप छुप के फिर वो भी मिले
मोहब्बत जो यूं फिर जवां हुई
तन्हाईयाँ भी सब मिटने लगीं
कस्मे हुईं वादे हुए
रुसवाईयों से भी डरने लगे
सपने भी फिर देखे गए
आखों से जो न बोझिल हुए
शाहिद जो कुछ मेरे बने
शाहिद जो कुछ उनके बने

और फिर क्या था...........

टूटे सभी वो ताजमहल
ख्वाबों में जो हमने चुने
इक कब्र फिर मेरी खुदी
इक कब्र फिर उनकी खुदी
कस्मे दबीं वादे दबे
और जिस्म भी दाबे गए
रोते हैं फिर तकदीर को
कैसे मिलें कैसे मिलें
पर अक्ल थी मारी गयी
जो जिस्म के भूखे थे हम
रूहें तो अब भी एक हैं
और बदनामियों से दूर हैं
हम भी हैं खुश वो भी हैं खुश
और खुशनमाँ माहौल है
रूहें तो अब भी एक हैं
रूहें तो अब भी एक हैं

(कौशल किशोर) कानपुर

4 comments:

  1. मैंने आज के दौर में दर्द खाए प्यार करने वालों के लिए कुछ लिखने की कोशिश की है......अगर पसंद आये तो जरुर सराहें.

    आप का कौशल किशोर.

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  2. bhai ...
    yeh to dil ko chu gayin .....
    Maine jo umeeden lagayi thi vo bhi toot gayin ...
    tum itna acha likhte ho kabhi socha na tha..
    toote huye dil main ishk ki yeh kashmkash ko kabhi is tarah shabdon main padha na tha ....

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  3. एक सम्पूर्ण पोस्ट और रचना!
    यही विशे्षता तो आपकी अलग से पहचान बनाती है!

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