ग़मों की काली छाया

जो तुमने दास्ताँ अपनी सुनाई आँख भर आई
बहुत देखे थे दुःख मैंने मगर क्यूं आँख भर आई

ग़मों से दुश्मनी लगती है बिलकुल दोस्ती जैसी
खुदा भी जल गया हमसे कि जब ये दोस्ती देखी

खराशें दिल में हैं तो फिर मुझे नश्तर से क्या डर है
डराना है अगर मुझको तो फिर कुछ और गम देदो

सुकूँ मुझको नहीं मिलता है इस बेपाख़ दुनिया में
तमन्ना अब तो इतनी है कि फिर से जनम देदो

जहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ हों और खुशियाँ ही खुशियाँ हों
ग़मों की काली छाया से न कोई इल्म मेरा हो

Comments

  1. वाह!... बेहद खूबसूरत अश`आर!

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  2. कल 30/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. बहुत बढ़िया....आपसे निवेदन है कि कठिन शब्दों जैसे 'बेपाख़' इत्यादि के अर्थ भी साथ में ही दे दिया करें जिससे मुझ जैसे बहुतों को बहुत कुछ नया सीखने में मदद मिलेगी

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  4. खराशें दिल में हैं तो फिर मुझे नश्तर से क्या डर है
    डराना है अगर मुझको तो फिर कुछ और गम देदो

    खुबसूरत लफ़्ज़ों का मजमुआ ... ग़ज़ल क्या कही बस ग़म को कागज़ पे उतार दिया..

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  5. Badhiya....

    www.poeticprakash.com

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  6. बहुत खूब कहा है आपने
    नववर्ष की अनंत शुभकामनाओं के साथ बधाई ।

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  7. ग़मों से दुश्मनी लगती है बिलकुल दोस्ती जैसी
    खुदा भी जल गया हमसे कि जब ये दोस्ती देखी.बहुत खूब.

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  8. जो तुमने दास्ताँ अपनी सुनाई आँख भर आई
    बहुत देखे थे दुःख मैंने मगर क्यूं आँख भर आई

    dard jab kisi apne ka ho to jyada saalta hai. achha laga aapko padhna.

    shubhkamnayen

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  9. very informative post for me as I am always looking for new content that can help me and my knowledge grow better.

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