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क्षणिकाएं

दीदार हो न जाये उनका मैं डरता हूँ ये सोच के उनकी गली से ना गुजरता हूँ पर क्या करूँ जन्नत है उस गली में ही ये सोच के छुप छुप के मैं गुजरता हूँ

क्षणिकाएं

आज फिर दिल ने उन्हें याद किया मेरी बर्बादियों को और भी बर्बाद किया ग़म जो थे दिल के किसी कोने में दफ्न उनके तोहफों ने फिर उनका आगाज़ किया

क्षणिकाएं

इक दिल तो है पर गम-ए-दर्द कहा से लाऊं लिखने का शौक तो है पर शब्द कहा से लाऊँ कोशिश जो की गम-ए-रुसवाई को लिखने की पर चेहरों को पढने की नज़र कहा से लाऊं